Sunday, September 6, 2009

ताकि सनद रहे


बहुत दिनों से सोच रहा था, कुछ लिखूं ! बीच में लंबा ब्रेक हो गया, ब्लॉग कई दिनों से मेरा इंतजार कर रहा था, इसे तोड़ना था , सो फिर आ गया अपनी तनहाइयों को लेकर आप के पास ! बहुत कुछ है इस बार, लिखने के लिए ! मेरे कुछ और साथियों को भी मैंने ब्लॉग पर देखा, अच्छा लगा !

दुःख हुआ तो यह जानकर कि वे परेशां हैं , इसलिए कि उनके ब्लॉग पर कोई टिपिया नही रहा है ! इनमें से कुछ झूटी प्रशंसा के सहारे बड़े लेखक का रुतबा लिए शाम को किसी बार में अपने ही जैसे चंद लेखकों के साथ कोसते हुए मिल जाते हैं सिस्टम को , साथ ही दूसरे किसी लेखक कि खिल्ली उडाते हैं ! उनका यह नित्यकर्म जारी है ! वे लेखक हैं और उन जैसा कोई दूसरा तो हो ही नही सकता, इसी मुगालते में उन्होंने कुत्ता भी पाल लिया है !

कुँए के मेंडक , कुत्ते के साथ खूबसूरत नज़र आ रहे हैं ! अपने ही लोगों को ब्लॉग पर लिखे पर प्रतिक्रिया के बदले कुछ अच्छा बताने या प्रशंसा करने कि कह रहे हैं ! कितना गिर गये हैं दो बंदरों कि तरेह एक -दूसरे कि पीठ खुजला रहे हैं ! सब लेखक हैं इसलिए , यह सुब अच्छे से कर रहे हैं ! सबको पता है कि आज इसकी तो कल हमारी बारी है

हम धन्य हैं , हमारे ये नई पीढी के लेखक, बहुत अच्छा लिख रहे हैं ! अपने लिखे पर मंत्रमुग्द होने कि परम्परा को जिन्दा रखने कि कवायद में क्या कुछ नही करना पढ़ रहा है उन्हें ! अच्छा है लगे रहिये भगवन आपकी खूब सुने! कुछ नए जर्नलिस्ट तो मस्का लगाने के लिए अच्छी प्रतिक्रिया दे ही देंगे ! सच कबूल करना सीखिए साहेब , कुँए से निकलो , बाज़ार मैं आओ ताकि पता लग जाए , पतीली कितनी खली है , और भी लोग पढ़ना -लिखना जानते हैं , साक्षरता की रेट बढ़ गई है ! धन्यवाद पढ़कर गलियां जरूर बकें !

Wednesday, January 28, 2009

पहली बार

आपके सामने पहली बार मुखातिब हो रहा हूँ । सच और ईमानदार, इन दोनों शब्दों पर बहस के लिए एक भीड़ है। इन सबके मजबूत दावों के बीच मैं अकेला हूं । न पूरी तरह सच्चा न पूरी तरह ईमानदार। बावजूद इसके बहस में शामिल हूं । ऐसा नहीं है कि कोई चोरी - डकैती की है या फिर रिश्वत- बैमानी से पैसा कमाया है। लेकिन बचपन में पापा कि जेब से पैसे चुराए हैं, मां से झूठ बोला, लिहाजा ईमानदार होने का कोई सबूत पेश नहीं कर सकता।

ब्लॉग का नाम मुद्दा इसलिए ही रखा है । सच के करीब होना भी बहुत बड़ी बात है। हम उनसे अच्छे हैं जो दूसरों को चोर बताने में जुटे हैं, ख़ुद कि ईमानदारी का डंका पीट रहे हैं, बावजूद यह जानते हुए कि ईमानदारी के झूठे दावे से बेमानी का सच कबूल करना ज्यादा अच्छा है। खैर बहस का ठेका हमारा नहीं है, जिन्हें करना है वे करें ।

उसकी सारी शख्सियत नखों और दांतो की वसीयत है वे वक्त के लिए वह एक शानदार छलांग है अंधेरी रातों का जागरण है नींद के खिलाफ नीली गुर्राहट , आसानी के लिए तुम उसे कुत्ता कह सकते हो उस लपलपाती हुई जीभ और हिलती हुई दुम के बहुत से लोग हमारे बीच हैं

उनका पालतूपन हरकत कर रहा तुम्हारी शराफत से इसका कोई वास्ता नहीं है उनकी
नज़र न कल पर थी, न आज पर है बहसों से अलग वह हड्डी के एक टुकड़े भर (सीझे हुए) अनाज पर उनकी निगाह है सिर्फ एक बार अपने खून में जहरमोहरातलाशती हुई मादा को बाहर निकालने के लिएवह तुम्हारी जंजीरों से शिकायत करता हैअन्यथा पूरा का पूरा वर्ष उसके लिए घास हैउसकी सही जगह तुम्हारे पैरों के पास हैमगर तुम्हारे जूतों में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं उनकी
नज़र जूते की बनावट नहीं देखतीऔर न उसका दाम देखती हैवहां, वह सिर्फ बित्ता भर मरा हुआ चाम देखती हैऔर तुम्हारे पैरों से बाहर आने तकउसका इंतज़ार करती है (पूरी आत्मीयता से)उसके दांतों और जीभ के बीच लालच की तमीज़ है जोतुम्हें जायकेदार हड्डी के टुकड़े की तरह प्यार करती हैऔर वहां, हद दर्जे की लचक है, लोच है, नर्मी हैमगर मत भूलो कि इन सबसे बड़ी चीज़ वह बेशर्मी हैजो अंत में तुम्हें भी उसी रास्ते पर लाती हैजहां भूख उस वहशी को पालतू बनाती है।।

यही सब है, जो sikhata है की aadmee banne से अच्छा है कुत्ता बन jao बहुत से कुत्ते mara matlab आदमी इन दिनों aiase ही najer आ rehe हैं

सच जो किसी को दिखता नहीं

शोहरत , नाम पर लगा गलतफहमियों का ढेर होता है जिसे भी यह मिली , बौरा सा गया , कोई कम तो कोई थोड़ा ज्यादा जिसे नहीं मिल पाई वो पूरे मनोयोग से जुटा है , उम्मीद पूरी होगी , उसे शायद यही मुगालता है अब पालने को कोई कुत्ता पलता है तो कोई मुगालता सब की अपनी - अपनी स्वतंत्रता की दुहाई है , सो सब पाल सकते हैं , कुत्ता भी और मुगालता भी



सो इन दिनों बहुत से लोग अपने- अपने मुगालते के साथ बाज़ार में हैं एक भीड़ सी है , जो लिखा सो छप गया है , इसलिए बड़े लेखक हो गये हैं लिटरेचर फेस्टिवल में जा कर आए हैं , इसलिए इनका लोहा तो मानना भी जरूरी है उनके पास बहुत से किस्से हैं , सुनाने को , बहुत से बड़े सेलिब्रिटी से वे मिल चुके हैं , इसलिए वे बता सकते हैं कि उनके बारे में ज्यादा तफसील से आप और हम अनपढ़ हैं , शायद इसलिए वे बता देते हैं किसी लेखक कि लिखी किताब के बारे में कि वह किताब कैसी रही , वे एक पाठक कि तरह नही बोलते , वे एक समीक्षक की तरह बताते हैं कि इतना बड़ा लेखक बेचारा कितनी गलती कर बैठा



ये सब हमारे इर्दगिर्द ही घूम रहे हैं , वे जो लिखते हैं , वो हमेशा अच्छा होता है इसके इसे ऐसे ऐसे भी ऐसे में जो कुछ लिखा जा रहा है वो घटिया है वो लिखते हैं इसलिए कि वो जो लिखते हैं छप जाता है , अच्छी बात हैं

Tuesday, October 7, 2008

शर्म से डूब मरने की बात

शर्म से डूब मरने की ही तो बात है1 आतंककारी बम विस्फोट कर बेकसूरों की जान ले रहे हैं और एक नेता शहीद इंस्पेक्टर की भूमिका पर ही नही पूरी पुलिस के सिस्टम को गरिया रहा है ! आतंक की स्याही से भविष्य के भारत का चेहरा बिगाड़ने वाले आतंकी इन नेता की नजर में मासूम हो जाते हैं ! जिन्दगी की जदोजेहेद में जहाँ जख्म को भूल कर फिर से जीने की कोशिश शुरू की जा रही हो, वहां नेता के फिजूली बयान देने के इस शगल से कितनों को तकलीफ पहुँची होगी, पोरों पर गिनना बहुत मुशिकल है !
बावजूद इसके किसी को कोई फिक्र नही है, सब कुछ पुराने तोर तरीकों से ज्यों का त्यों जारी है! बयान देने के माहिर इस नेता का नाम अमर सिंह है! दो-तीन दिन नही देते तो हाजमा बिगड़ जाता है! फ़िर या तो उलटी होती है या फ़िर ....! वो कुछ भी कह सकते हैं, मीडिया में उनकी खास पहुँच है !
बिग बी के खास, अनिल अम्बानी के खास, मुलायम और इन दिनों तो सोनिया के भी खास हैं! ऐसे में चमडे की जीभ फिसल ही जाती है, जामिया नगर में पुलिस आतंकियों को ढेर करती है तो ये साहेब एक शहीद इंस्पेक्टर के बारे में कुछ भी बल देते हैं! मायावती के सताए, मति के मारे अमर सिंह को शहीद की बेवा ने माकूल जवाब तो दे दिया, लेकिन चिकने घडे पर शर्म का पानी टिके तो कैसे!

Wednesday, October 1, 2008

वही रफ्तार बेढंगी, जो पहले थी सो अब भी है

फिर एक हादसा, लाशों का ढेर! गलती किसकी, सरकार की, मन्दिर प्रशासन की, पुलिस या फिर उनकी जो माँ चामुंडा के शीश नवाने आए थे! बहुत से ऐसे सवाल हर घर से उठ रहे हैं! जोधपुर के इस मन्दिर की एक ढलान ने इन घरों के लाल छीन लिए ! सरकारी संस्कार अन्तिम संस्कार से पहले हो चुका है ! अब गलती तलाशी जा रही है ! हादसे की जाँच के लिए सरकार ने समिति बना दी है, मन्दिर प्रशासन भी कोई तोड़ निकल ही लेगा, लेकिन अपनों को खोने वाले क्या करेंगे! यही बदा था हमारी किस्मत में, शायद यही सोच कर चुपचाप बैठ जायेंगे! हमेशा की तरह सबकुछ शायद यही होगा ! जाँच की रिपोर्ट या तो आयेगी ही नही! आई भी तो क्या नया होगा, बताने की जरूरत नही है ! दो दिन तक चला बंदोबस्त फिर हट जाएगा, दूसरा हादसा होने के लिए!

मैंने देखा है एक चिडिया को अपने घोंसले में रखे अंडे बचाने की जद्दोजेहेद करते! अपने से तिगने आकर के एक बड़े पक्षी से लड़ते हुए! इस लम्बी लडाई में चिडिया लहूलुहान हो गई लेकिन उसने जीत ली जंग और बचा लिए अपने बच्चे! यहाँ माँओं को बच्चे बचाने का मौका ही नही मिला! सुहाग गया था घर की बरक्कत मांगने, लेकिन मिल गई मौत! बहुत से बच्चे अब कभी अपने पिता से कोई ख्वाइश नही क़र पाएंगे ! बावजूद इसके कोई नही समझेगा इनका दर्द! कुछ दिन बाद फिर सबकुछ पहले जैसा होने वाला है!

ऐसे बहुत से मन्दिर हैं, जहाँ चढावे के आलावा कुछ उनकी प्राथमिकता में शामिल नही होता! कुछ ऐसे भी हैं जहाँ जल्द दर्शन के लिए बड़े लोगों को भगवान् से कम नही समझा जाता! एक आम भक्त की किस्मत में यहाँ भी सिर्फ कतार ही होती है, राशन की मानिंद! हमारे पास कहने के लिए सिर्फ़ इतना है कि भगवान् के इन भक्तों कि भी सोचोअब जग जाओ, मौत के इस सैलाब से भी सीख ले लो!