Wednesday, October 3, 2018

मां की मुराद
संदीप पाण्डेय
टूटा-फूटा घर पूरी तरह गिरने के मुहाने पर खड़ा था। आसपास के मकानों के आलीशान होने की शर्मिंदगी घर में बच्चों से लेकर बड़े तक झेल रहे थे। रकम थी नहीं तो कोशिश की बात तक नहीं होती थी। कमाई सब भाइयों की इतनी थी कि जिंदगी की जरूरतें जैसे-तैसे पूरी हो रही थीं। घर चल रहा था, बड़ी ख्वाहिशें तो पूरी नहीं होती थीं, लेकिन छोटी इच्छाओं के पूरी होने पर फक्र कर लेते थे। और बस खुशी इस बात की थी कि किसी के आगे मदद मांगने की बेइज्जती से बचे हुए थे। इस बार की बारिश में कहीं ढह न जाए आशियाना, इसी चिंता से आने वाले झूठे ख्वाबों का सिलसिला भी लगभग बंद सा हो गया था। रोजाना सुबह अखबार पर नजर डालते, चाय की चुस्कियों के बीच घर के सभी लोग बीमार मकान के ‘इलाज’ पर चर्चा तो शुरू करते, लेकिन यह लंबी नहीं खिच पाती। इसकी वजह भी साफ थी कि सीमेंट/गारा हो या फिर ईंट/बजरी ये सब दाम होगा तभी तो हो पाएगा। कारीगर/बेलदार अपनी पगार लेगा, सो अलग। यही हिसाब तमाम प्रयासों पर पानी फेर देता। कभी-कभी कौन-कितना खर्च करेगा, इस मुद्दे पर भी जब बात शुरू होती थी तो थोड़ा गरमा-गरमी तक हो जाती थी। फिर थोड़ा नाराज होकर सब अपने-अपने कमरों में जा घुसते, बरामदा खाली रह जाता। बस मां उसमें बैठे-बैठे बड़बड़ाने लगती। अब उसे चुप कराने की हिम्मत किसी में थी ही नहीं। माहौल को सामान्य करने के लिए बीते पन्ने पलटने लगती। कभी गुस्से से तो कभी हलके में बताने लगती कि कितनी मुश्किल से खरीदा गया था मकान। कितना घूमे शहर में,  कभी मकान जचता तो औकात देखकर चुप हो जाते तो कभी हैसियत के मुताबिक मिलता तो वो उन्हें पसंद नहीं आता। मां जब कभी भी यह व्यथा-कथा शुरू करती, पता नहीं क्यों मैं उनको ध्यान से सुनता रहता। उदास हो जाता, पैसा न हो पाने पर कोसने लगता अपने नसीब और भगवान को या फिर मुस्कुराकर सबकुछ अच्छा होने की उम्मीद पर टाल देता। यह जरूर था कि उनकी जुबान से हर आठ-दस दिन में यही सब सुनाई दे जाता था। ये सबकुछ मुझे भी रट सा गया था। पिता बड़ी मेहनत से खरीद पाए थे, इस मकान को। साइकिल पर हर रविवार नई-नई कॉलोनियों में जाकर बच्चों के लिए घर का सपना संजोते। यह अलग बात थी कि उन्होंने जिंदगी के तकरीबन पैंतालीस बरस किराए के मकान में जाया कर दिए। इसमें बीस बरस एक विवादास्पद मकान में जमे किराएदारों को निकलवाने के लिए कोर्ट के चक्कर लगाए। कानून की कमजोरियां से वाकिफ थे। वकील साहब बार-बार केस जीतने का दावा जताते थे और पिता-घर परिवार के लिए मेहनत कर कमाए चंद रुपए का एक बड़ा हिस्सा इसी केस पर खर्च कर चुके थे। जैसे-तैसे मकान खाली हुआ फिर बिक गया। दूसरा मकान ढूंढने में कुछ बरस बीत गए। कभी मां को साथ ले जाते तो कभी अपने ही साथियों के साथ निकल पड़ते। नई-नई बसती कॉलोनियों में दूरी नहीं देख रहे थे, वे अपनी मजबूरी के बीच आशियाने की ललक लिए फिर रहे थे। उन्हें पता था कि रकम मामूली सी है, उधार के सहारे ही यह सब हो पाएगा। आखिरकार मकान ले ही लिया। बिना नांगल-मुहूर्त के उसमें रहने आ गए। रिश्तेदार/मित्रों को भोजन कराने की स्थिति में नहीं थे। अब उनके मकान की कोई सार-संभाल ही नहीं कर रहा। हाल यही रहे तो एक दिन भरभरा कर गिर जाएगा। सब आ जाएंगे सडक़ पर, फिर क्या करेंगे। ऐसा नहीं था कि सब भाई मकान को दुरुस्त कराने की सोचते नहीं थे, लेकिन रजिस्ट्री के अभाव में लोन की दिक्कत तो थी ही, कुछ आशंकाएं भी थीं जो जैसे-तैसे गुजरने पर सबको विवश कर देती थी। एक दिन मां के इसी गुस्से से अवसाद में आ गया। मां गलत भी कहां कहती है? रात को नींद भी नहीं आई। सुबह उठा तो देखा मां कुर्सी पर बैठी है। पोते-पोतियों के साथ मन बहलाने में लगी है। बात करने की मेरी तो हिम्मत ही नहीं थी। अखबार ढूंढ ही रहा था कि मां बोली, चाय पी ली।  मैं हां-हूं कहकर अखबार लेकर बैठ गया। नींद न आने का असर चेहरे पर दिख रहा था। मां ही बोली, सोया नहीं रात को। इतना सुनते ही मैं फूट-फूटकर रोने लगा। तेज आवाज में बोलना शुरु कर दिया, तुम्हें पता है, तनख्वाह और खर्च के बाद कितना बच पाता है। ऐसे में कैसे हो मकान सही। यह भी सही है कि सब मिलकर जिम्मेदारी को समझें तो यह हो जाए, लेकिन शायद...। इतना ही कह पाया था कि मां खड़ी हो गई, बोलीं...बेटा मैं भी समझ रही हूं। जितना सब कमाते हैं, खर्च हो जाता है, पर मां हूं...कहूं नहीं क्या? घर में सब खुश रहें पर घर के बारे में सोचें भी तो सही। इसीलिए तो कहती हूं।   बुरी लगती है मेरी बात पर जब तेरे पिता ने अकेले अपनी मेहनत की कमाई से इसे खरीद लिया तो क्या इसे सुधरवाने के लिए तुम सबको कोई बेईमानी करने की कह रही हूं। अरे, घर तो अंतिम शरण स्थली है, यहीं पर ही तनाव/चिंता और डर के साथ जिए तो फिर सुकून से कहां रह पाओगे। मां की बातें आंख खोलने वाली थी। अखबार  कोने में पटक दिया था। इस शोर-शराबे से पूरा घर बरामदे में खड़ा था। मैं खामोश था, मां बोले जा रही थी कि देख यहां से पाइप टूट गया, यहां पलस्तर होना बाकी है, ये दरवाजा भी अंतिम सांस ले रहा है। सब एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराने की कोशिश करने लगे थे, लेकिन मुस्कान चेहरे पर आ नहीं पा रही थी। मां के हर शब्द को सब गंभीरता से सुन रहे थे। न कोई बोल रहा था, न कोई मजबूरी बताने की पहल को आतुर हो रहा था। मैं भी अब तक थोड़ा सामान्य हो चुका था। अपने आप को ही धिक्कारने लगा। पिछले कई दिनों से सोच रहा था कि मकान बेच देते हैं। सब अपना-अपना हिस्सा ले लें और अपनी व्यवस्था देखें। इस फैसले पर खुद ही सहमत नहीं हो पाता था, इसकी वजह यह भी थी कि जानता था कि चार हिस्सों में बंटी एक मकान की कीमत से हासिल कुछ नहीं होने वाला था। यह भी सच था कि चारों अपने-अपने लिए एक कमरे का छोटा प्लॉट तक नहीं ले सकते थे। पिता और मां की इस निशानी को संभालने की जिद के चलते इस बेहया प्लान को ठुकरा दिया। हम भाई इस बात पर ही खुश थे कि बहस भले ही कितनी तीखी हो, लड़ाई/झगड़े के पाले नहीं खिंच रहे। बंटवारा नहीं हो रहा न मकान बेचने की बात कोई उठाने की जुर्रत कर रहा है। मां की मुराद पूरा करने की जिद पर मैं निकल रहा था घर से। आशियाने के सपने कभी छोटे नहीं हुआ करते, मां ने यही कहा...घर-घर होता है, अपना घर कितना टूटा-फूटा हो उसे संभाला इसलिए जाता है कि मजबूरियां मखौल न बन जाए। भाई भी अब एकमत होने लगे थे। मकान को सुधारने/संवारने की कोशिश में सबने सहमति दे दी थी। मां ने आंसू रोकने की नाकाम कोशिश के बीच रूंधे गले से कहा, मेरे बच्चों घर को सलीके से सजाओगे तो जिंदगी में सुकून ही सुकून मिलेगा। बिखरे घर में आशंकाओं का डेरा होता है और आशंकाएं चैन से सोने नहीं देती। घर की खूबसूरती मां के चमकते चेहरे से सबको नजर आ गई।


दोस्तों,
 कुछ दिनों पहले मेरी यह कहानी आकाशवाणी से प्रसारित हुई थी। जिंदगी की असलियत को कुछ यूं उतारने की कोशिश की। जिसमें घर की मुश्किलों के बीच सहने और जुड़े रहने की परिवार के हर सदस्यों की सहने के जज्बे को भी शब्दों में पिरोया है। 


मां की मुराद
संदीप पाण्डेय
टूटा-फूटा घर पूरी तरह गिरने के मुहाने पर खड़ा था। आसपास के मकानों के आलीशान होने की शर्मिंदगी घर में बच्चों से लेकर बड़े तक झेल रहे थे। रकम थी नहीं तो कोशिश की बात तक नहीं होती थी। कमाई सब भाइयों की इतनी थी कि जिंदगी की जरूरतें जैसे-तैसे पूरी हो रही थीं। घर चल रहा था, बड़ी ख्वाहिशें तो पूरी नहीं होती थीं, लेकिन छोटी इच्छाओं के पूरी होने पर फक्र कर लेते थे। और बस खुशी इस बात की थी कि किसी के आगे मदद मांगने की बेइज्जती से बचे हुए थे। इस बार की बारिश में कहीं ढह न जाए आशियाना, इसी चिंता से आने वाले झूठे ख्वाबों का सिलसिला भी लगभग बंद सा हो गया था। रोजाना सुबह अखबार पर नजर डालते, चाय की चुस्कियों के बीच घर के सभी लोग बीमार मकान के ‘इलाज’ पर चर्चा तो शुरू करते, लेकिन यह लंबी नहीं खिच पाती। इसकी वजह भी साफ थी कि सीमेंट/गारा हो या फिर ईंट/बजरी ये सब दाम होगा तभी तो हो पाएगा। कारीगर/बेलदार अपनी पगार लेगा, सो अलग। यही हिसाब तमाम प्रयासों पर पानी फेर देता। कभी-कभी कौन-कितना खर्च करेगा, इस मुद्दे पर भी जब बात शुरू होती थी तो थोड़ा गरमा-गरमी तक हो जाती थी। फिर थोड़ा नाराज होकर सब अपने-अपने कमरों में जा घुसते, बरामदा खाली रह जाता। बस मां उसमें बैठे-बैठे बड़बड़ाने लगती। अब उसे चुप कराने की हिम्मत किसी में थी ही नहीं। माहौल को सामान्य करने के लिए बीते पन्ने पलटने लगती। कभी गुस्से से तो कभी हलके में बताने लगती कि कितनी मुश्किल से खरीदा गया था मकान। कितना घूमे शहर में,  कभी मकान जचता तो औकात देखकर चुप हो जाते तो कभी हैसियत के मुताबिक मिलता तो वो उन्हें पसंद नहीं आता। मां जब कभी भी यह व्यथा-कथा शुरू करती, पता नहीं क्यों मैं उनको ध्यान से सुनता रहता। उदास हो जाता, पैसा न हो पाने पर कोसने लगता अपने नसीब और भगवान को या फिर मुस्कुराकर सबकुछ अच्छा होने की उम्मीद पर टाल देता। यह जरूर था कि उनकी जुबान से हर आठ-दस दिन में यही सब सुनाई दे जाता था। ये सबकुछ मुझे भी रट सा गया था। पिता बड़ी मेहनत से खरीद पाए थे, इस मकान को। साइकिल पर हर रविवार नई-नई कॉलोनियों में जाकर बच्चों के लिए घर का सपना संजोते। यह अलग बात थी कि उन्होंने जिंदगी के तकरीबन पैंतालीस बरस किराए के मकान में जाया कर दिए। इसमें बीस बरस एक विवादास्पद मकान में जमे किराएदारों को निकलवाने के लिए कोर्ट के चक्कर लगाए। कानून की कमजोरियां से वाकिफ थे। वकील साहब बार-बार केस जीतने का दावा जताते थे और पिता-घर परिवार के लिए मेहनत कर कमाए चंद रुपए का एक बड़ा हिस्सा इसी केस पर खर्च कर चुके थे। जैसे-तैसे मकान खाली हुआ फिर बिक गया। दूसरा मकान ढूंढने में कुछ बरस बीत गए। कभी मां को साथ ले जाते तो कभी अपने ही साथियों के साथ निकल पड़ते। नई-नई बसती कॉलोनियों में दूरी नहीं देख रहे थे, वे अपनी मजबूरी के बीच आशियाने की ललक लिए फिर रहे थे। उन्हें पता था कि रकम मामूली सी है, उधार के सहारे ही यह सब हो पाएगा। आखिरकार मकान ले ही लिया। बिना नांगल-मुहूर्त के उसमें रहने आ गए। रिश्तेदार/मित्रों को भोजन कराने की स्थिति में नहीं थे। अब उनके मकान की कोई सार-संभाल ही नहीं कर रहा। हाल यही रहे तो एक दिन भरभरा कर गिर जाएगा। सब आ जाएंगे सडक़ पर, फिर क्या करेंगे। ऐसा नहीं था कि सब भाई मकान को दुरुस्त कराने की सोचते नहीं थे, लेकिन रजिस्ट्री के अभाव में लोन की दिक्कत तो थी ही, कुछ आशंकाएं भी थीं जो जैसे-तैसे गुजरने पर सबको विवश कर देती थी। एक दिन मां के इसी गुस्से से अवसाद में आ गया। मां गलत भी कहां कहती है? रात को नींद भी नहीं आई। सुबह उठा तो देखा मां कुर्सी पर बैठी है। पोते-पोतियों के साथ मन बहलाने में लगी है। बात करने की मेरी तो हिम्मत ही नहीं थी। अखबार ढूंढ ही रहा था कि मां बोली, चाय पी ली।

Tuesday, October 2, 2018

gazal sangreh..jhooth se alag

सादर नमस्ते

मेरा गजल संग्रह झूठ से अलग हाल ही में बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। आज के हालातों और सियासी हलकों की करीब 96 गजलों का ये गुलदस्ता है। आपको बताते हुए हर्ष हो रहा है कि हिंदुस्तान, अमेर उजाला, राजस्थान पत्रिका सहित करीब एक दर्जन अखबारों ने मेरी पुस्तक पर समीक्षा प्रकाशित की है। ख्वाहिश है कि आप भी इसे पढ़ें। मेरी मेहनत को सराहें नहीं तो कम से कम खामियां ही बता दें ताकि सुधार कर सकूं। मैं चाहता हूं कि मेरे मित्र/जानकार तक मेरी यह मेहनत पहुंचे। इससे पहले भी काव्य संग्रह कोशिश कागज पर प्रकाशित हो चुका है। आप पुस्तक के बारे में 9829255841 पर व्हाट्सएप कर अपना पता नोट कराएं। मेरा संबल बढ़ाएं...

सादर

संदीप पाण्डेय



Tuesday, September 19, 2017

कभी जनहित में भी तो कीजिए हड़ताल संदीप पाण्डेय मांग पूरी नहीं होती। सरकार के आश्वासन के ‘राशन’ से आखिर कब किसका पेट पूरा भरा है। अब हड़ताल-धरना-प्रदर्शन ‘बहुतायात’ में होते हैं। कर्मचारी/ अधिकारी संगठन भी अलग-अलग खेमे हैं। एक सरकार के साथ तो दूसरा विपक्ष से ‘गलबहियां’ करते हुए चलता है। विरोध के सुर स्वयं ‘हितार्थ’ या यूं कहें कि अपने हक को लेकर ही ज्यादा होता है। यही हाल राजनीतिक दलों का है, जो विपक्ष में होता है, उसे भी जनता के हित का तभी ध्यान आता है। सरकार बनने के बाद जनता की परेशानियों से दूरी बनाने का दायित्व बखूबी निभाया जाता है। चिकित्सक हड़ताल/सामूहिक अवकाश पर चले गए तो सरकारी ‘तामझाम’ सामने आ गया। नागौर में उपचार के अभाव में वृद्ध महिला व नवजात की मौत हो गई। जबकि करीब आधा दर्जन मरीजों की स्थिति गंभीर होने पर उन्हें हायर सेंटर रेफर किया गया। इसी प्रकार सर्दी, जुखाम सहित अन्य बीमारियों के मरीजों को भी जेएलएन अस्पताल से बिना उपचार लौटना पड़ा। जिले भर के सरकारी अस्पताल/ डिस्पेंसरी में मरीज खासे परेशान रहे। सरकारी खानापूर्ति भी हुई, ‘रस्म अदायगी’ के चलते डॉक्टर्स के स्थान पर आयुष चिकित्सक लगाकर ‘पल्ला’ झाड़ा गया। चिकित्सकों के अवकाश के दौरान मरीज खासे परेशान रहे। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के कार्मिकों के भी अवकाश पर रहने से मरीजों के दर्द को बयां करना मुश्किल है। लगातार हो रही हड़तालों और सोमवार को सेवारत डॉक्टरों के सामूहिक अवकाश के बाद सरकार ने चिकित्सा विभाग में 17 सितम्बर से 3 महीने के लिए रेस्मा लागू कर दिया है। इससे क्या जनता की तमाम परेशानियां खत्म हो गईं। राज्य कर्मचारी/ आंगनबाड़ी/लेब टेक्नीशियन समेत बहुत से ‘नाराज’ बाहें चढ़ाकर मैदान में आ चुके हैं। फिलहाल डॉक्टर्स के ‘तेवर’ तीखे हैं और पब्लिक ‘निढ़ाल’। उनकी 33 सूत्री मांगों पर कार्रवाई हो, इस पर राज्य सेवारत चिकित्सक संघ ने गत माह की 31 तारीख को चिकित्सकों के सामूहिक अवकाश पर जाने की चेतावनी दी थी। इसके बाद राज्य सरकार ने 15 दिन में सकारात्मक हल निकालने का आश्वासन दिया था, पर बात बनी नहीं। चिकित्सकों की यह कोई पहली हड़ताल नहीं है। चिकित्सकों की यह कोई प्रदेश में पहली हड़ताल नहीं है। बरसों में पता नहीं कर्मचारी/ शिक्षक/ डॉक्टर्स कितनी बार हड़ताल पर उतरे, लेकिन हमेशा उनकी खुद की मांगों के आगे जनता ‘गौण’ हो गई। कभी न ऐसा सुना गया न देखा गया कि जनता की मांगों को लेकर कोई कर्मचारी अथवा अधिकारी संगठन आंदोलन पर उतरा हो। मकराना में राजकीय चिकित्सालय में चिकित्सक, नर्सिंग स्टॉफ इत्यादि के कुल 61 पद स्वीकृत थे । वर्तमान में 55 पद में से 28 पद रिक्त हैं। कुचामनसिटी का राजकीय चिकित्सालय 150 बेड में क्रमोन्नत हो चुका है, लेकिन सुविधाएं आज भी 50 बेड के बराबर है। चिकित्सकों की संख्या तो बढ़ीं, लेकिन सुविधाओं की ‘किल्लत’ बरकरार है। परबतसर, डीडवाना, पादूकलां, मेड़तासिटी, रियांबड़ी, लाडनूं, नावांसिटी ही नहीं नागौर की डिस्पेंसरी की हालत भी कोई खास अच्छी नहीं है। बहुत सी खामियां है जो मरीजों को ‘मुंह’ चिढ़ा रही है। कहीं जांच की सुविधा नहीं तो कहीं दवा नहीं तो कहीं स्टाफ की कमी। तिल-तिल ‘घिसट’ रहे रोगियों पर तो ‘दया’ नहीं की जाती। अस्पताल/डिस्पेंसरियों की खामियों के लिए तो हड़ताल/धरना/प्रदर्शन नहीं होते। सरकार खामियां दूर नहीं करती, जनता की सुनवाई नहीं होती और चिकित्सक/ नर्सिंग स्टाफ का अपना तर्क है कि ये काम उनका नहीं है। केवल चिकित्सक ही नहीं, कोई कर्मचारी संगठन हो या बार एसोसिएशन। शिक्षक संघ हो या अधिकारी यूनियन। जनता की मांग पर आंदोलन करते ‘नजर ’ नहीं आते। यह जिम्मा विपक्ष का बताया जाता है, सरकार सुनने में थोड़ा ‘कमजोर’ होती है। ऐसे में जनता का ‘हक’ न कभी ढंग से मांगा जाता है न उसकी सुनवाई होती है। कभी जनहित में भी तो हड़ताल करें चिकित्सक/इंजीनियर/ अफसर/कर्मचारी/वकील, ताकि जनता का साथ मिले। अपने-अपने हक के लिए बार-बार जनता को परेशान करना भी कहां तक ठीक है? समझौता वार्ता में कभी जनता की ‘दिक्कतों’ पर भी तो बातचीत कीजिए। सरकारी स्कूल/कॉलेजों की मुश्किलों पर शिक्षक/व्याख्याता, मरीजों की परेशानियों पर चिकित्सक/नर्सिंग स्टॉफ, अतिक्रमण से परेशान जनता के हित में परिषद/पालिका कर्मी, पानी/बिजली की किल्लत पर जलदाय/विद्युतकर्मी लें सामूहिक अवकाश या करें हड़ताल। ताकि जनहित की नई इबारत लिखी जाए। sharsh.pandey0@gmail.com

Sunday, September 6, 2009

ताकि सनद रहे


बहुत दिनों से सोच रहा था, कुछ लिखूं ! बीच में लंबा ब्रेक हो गया, ब्लॉग कई दिनों से मेरा इंतजार कर रहा था, इसे तोड़ना था , सो फिर आ गया अपनी तनहाइयों को लेकर आप के पास ! बहुत कुछ है इस बार, लिखने के लिए ! मेरे कुछ और साथियों को भी मैंने ब्लॉग पर देखा, अच्छा लगा !

दुःख हुआ तो यह जानकर कि वे परेशां हैं , इसलिए कि उनके ब्लॉग पर कोई टिपिया नही रहा है ! इनमें से कुछ झूटी प्रशंसा के सहारे बड़े लेखक का रुतबा लिए शाम को किसी बार में अपने ही जैसे चंद लेखकों के साथ कोसते हुए मिल जाते हैं सिस्टम को , साथ ही दूसरे किसी लेखक कि खिल्ली उडाते हैं ! उनका यह नित्यकर्म जारी है ! वे लेखक हैं और उन जैसा कोई दूसरा तो हो ही नही सकता, इसी मुगालते में उन्होंने कुत्ता भी पाल लिया है !

कुँए के मेंडक , कुत्ते के साथ खूबसूरत नज़र आ रहे हैं ! अपने ही लोगों को ब्लॉग पर लिखे पर प्रतिक्रिया के बदले कुछ अच्छा बताने या प्रशंसा करने कि कह रहे हैं ! कितना गिर गये हैं दो बंदरों कि तरेह एक -दूसरे कि पीठ खुजला रहे हैं ! सब लेखक हैं इसलिए , यह सुब अच्छे से कर रहे हैं ! सबको पता है कि आज इसकी तो कल हमारी बारी है

हम धन्य हैं , हमारे ये नई पीढी के लेखक, बहुत अच्छा लिख रहे हैं ! अपने लिखे पर मंत्रमुग्द होने कि परम्परा को जिन्दा रखने कि कवायद में क्या कुछ नही करना पढ़ रहा है उन्हें ! अच्छा है लगे रहिये भगवन आपकी खूब सुने! कुछ नए जर्नलिस्ट तो मस्का लगाने के लिए अच्छी प्रतिक्रिया दे ही देंगे ! सच कबूल करना सीखिए साहेब , कुँए से निकलो , बाज़ार मैं आओ ताकि पता लग जाए , पतीली कितनी खली है , और भी लोग पढ़ना -लिखना जानते हैं , साक्षरता की रेट बढ़ गई है ! धन्यवाद पढ़कर गलियां जरूर बकें !

Wednesday, January 28, 2009

पहली बार

आपके सामने पहली बार मुखातिब हो रहा हूँ । सच और ईमानदार, इन दोनों शब्दों पर बहस के लिए एक भीड़ है। इन सबके मजबूत दावों के बीच मैं अकेला हूं । न पूरी तरह सच्चा न पूरी तरह ईमानदार। बावजूद इसके बहस में शामिल हूं । ऐसा नहीं है कि कोई चोरी - डकैती की है या फिर रिश्वत- बैमानी से पैसा कमाया है। लेकिन बचपन में पापा कि जेब से पैसे चुराए हैं, मां से झूठ बोला, लिहाजा ईमानदार होने का कोई सबूत पेश नहीं कर सकता।

ब्लॉग का नाम मुद्दा इसलिए ही रखा है । सच के करीब होना भी बहुत बड़ी बात है। हम उनसे अच्छे हैं जो दूसरों को चोर बताने में जुटे हैं, ख़ुद कि ईमानदारी का डंका पीट रहे हैं, बावजूद यह जानते हुए कि ईमानदारी के झूठे दावे से बेमानी का सच कबूल करना ज्यादा अच्छा है। खैर बहस का ठेका हमारा नहीं है, जिन्हें करना है वे करें ।

उसकी सारी शख्सियत नखों और दांतो की वसीयत है वे वक्त के लिए वह एक शानदार छलांग है अंधेरी रातों का जागरण है नींद के खिलाफ नीली गुर्राहट , आसानी के लिए तुम उसे कुत्ता कह सकते हो उस लपलपाती हुई जीभ और हिलती हुई दुम के बहुत से लोग हमारे बीच हैं

उनका पालतूपन हरकत कर रहा तुम्हारी शराफत से इसका कोई वास्ता नहीं है उनकी
नज़र न कल पर थी, न आज पर है बहसों से अलग वह हड्डी के एक टुकड़े भर (सीझे हुए) अनाज पर उनकी निगाह है सिर्फ एक बार अपने खून में जहरमोहरातलाशती हुई मादा को बाहर निकालने के लिएवह तुम्हारी जंजीरों से शिकायत करता हैअन्यथा पूरा का पूरा वर्ष उसके लिए घास हैउसकी सही जगह तुम्हारे पैरों के पास हैमगर तुम्हारे जूतों में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं उनकी
नज़र जूते की बनावट नहीं देखतीऔर न उसका दाम देखती हैवहां, वह सिर्फ बित्ता भर मरा हुआ चाम देखती हैऔर तुम्हारे पैरों से बाहर आने तकउसका इंतज़ार करती है (पूरी आत्मीयता से)उसके दांतों और जीभ के बीच लालच की तमीज़ है जोतुम्हें जायकेदार हड्डी के टुकड़े की तरह प्यार करती हैऔर वहां, हद दर्जे की लचक है, लोच है, नर्मी हैमगर मत भूलो कि इन सबसे बड़ी चीज़ वह बेशर्मी हैजो अंत में तुम्हें भी उसी रास्ते पर लाती हैजहां भूख उस वहशी को पालतू बनाती है।।

यही सब है, जो sikhata है की aadmee banne से अच्छा है कुत्ता बन jao बहुत से कुत्ते mara matlab आदमी इन दिनों aiase ही najer आ rehe हैं

सच जो किसी को दिखता नहीं

शोहरत , नाम पर लगा गलतफहमियों का ढेर होता है जिसे भी यह मिली , बौरा सा गया , कोई कम तो कोई थोड़ा ज्यादा जिसे नहीं मिल पाई वो पूरे मनोयोग से जुटा है , उम्मीद पूरी होगी , उसे शायद यही मुगालता है अब पालने को कोई कुत्ता पलता है तो कोई मुगालता सब की अपनी - अपनी स्वतंत्रता की दुहाई है , सो सब पाल सकते हैं , कुत्ता भी और मुगालता भी



सो इन दिनों बहुत से लोग अपने- अपने मुगालते के साथ बाज़ार में हैं एक भीड़ सी है , जो लिखा सो छप गया है , इसलिए बड़े लेखक हो गये हैं लिटरेचर फेस्टिवल में जा कर आए हैं , इसलिए इनका लोहा तो मानना भी जरूरी है उनके पास बहुत से किस्से हैं , सुनाने को , बहुत से बड़े सेलिब्रिटी से वे मिल चुके हैं , इसलिए वे बता सकते हैं कि उनके बारे में ज्यादा तफसील से आप और हम अनपढ़ हैं , शायद इसलिए वे बता देते हैं किसी लेखक कि लिखी किताब के बारे में कि वह किताब कैसी रही , वे एक पाठक कि तरह नही बोलते , वे एक समीक्षक की तरह बताते हैं कि इतना बड़ा लेखक बेचारा कितनी गलती कर बैठा



ये सब हमारे इर्दगिर्द ही घूम रहे हैं , वे जो लिखते हैं , वो हमेशा अच्छा होता है इसके इसे ऐसे ऐसे भी ऐसे में जो कुछ लिखा जा रहा है वो घटिया है वो लिखते हैं इसलिए कि वो जो लिखते हैं छप जाता है , अच्छी बात हैं